किसी फीमेल की नाभि के 3 इंच नीचे धँस जाने की इच्छा ……में !

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उम्र मायने नहीं रखती, ना मायने रखती है सूरत। धर्म भी मायने नहीं रखता, ना मायने रखती है उस वेजाइना की जाति। भरी सड़क मायने नहीं रखती, तो ना मायने रखता है सुनसान। दिन-रात तो पहले भी मायने नहीं रखते थे, तो ना मायने रखता है कोई ख़ास दयार। रिश्ते कभी मायने नहीं रखे तो क्या मायने रखेंगे उनके लिए संस्कृति और समाज। पराई स्त्री तो कभी मायने नहीं ही रखी…..पर ना मायने रखी अपनी खुद की औलाद।

कश्मीर के कठुआ के घुमंतु परिवार जो अनुसूचित जाति(पसमांदा) में आता है, की 8 साल की बच्ची आसिफ़ा के साथ रेप करते हुए मर्दों के लिए आसिफ़ा बस मादा थी। हाँ उसका मुस्लिम और उम्र में बहुत छोटा होना उसे दबोच लिए जाने का बड़ा कारण था। इतनी छोटी बच्ची का शरीर जो किसी भी एंगल से सेक्स अपील नहीं करता था, वहशियत में पूरा छलनी कर दिया गया। उसके साथ सो कॉल्ड पवित्र कहे जाने वाले एरिया ‘मंदिर’ में हुई हैवानियत पर शर्मशार होने और उसे न्याय दिलाने के लिए आवाज़ बुलंद करने की बजाय भारत माता औऱ तिरंगे की आड़ में वहशियों को छुपा लेने की घटना इंसानियत पर लगा बदनुमा दाग है।

अब ऐसे ही तिरंगे, भगवे रंग, श्रीराम, श्रीकृष्ण, जय भवानी, वंदे मातरम या भारत माता की जय जैसे नारों से बलात्कारी बचाएँ जाएंगे।

ऐसा नहीं कि पहले ऐसे कभी हुआ नहीं पर हाँ अब इनके साथ ‘सैयां भये कोतवाल, अब डर काहे का’ कॉन्फिडेंस है। उत्तरप्रदेश के उन्नाव में भी पीड़िता के पिता की हत्या में भी यही हुआ और कश्मीर में आसिफ़ा के न्याय की माँग पर भी। अब अगली घटना का इंतज़ार कीजिये। आज आसिफ़ा है, कल शिवदेवी थी, डेल्टा मेघवाल थी, प्रियंका थी, जिशा थी ……आगे आपकी अपनी बेटी, बहन, दोस्त, गर्लफ्रैंड, पत्नी या कोई रिश्तेदार होगी।

हालाँकि महिलाओं के साथ बर्बरता, नई नहीं बल्कि हिंदू संस्कृति का अभिन्न अंश है। यदि ज्योतिबाफुले, सावित्रीबाई फुले, अम्बेडकर जैसे बहुजन नायक नहीं होते तो महिलाएँ न्याय के लिए खड़े होना तो दूर यहाँ फेसबुक पर भी विरोध जताने के लायक नहीं होतीं। उनकी महिलाओं के हक़ में इतनी कोशिशें करने बाद भी ये हालात हैं।

समाज में यह सब देखकर भी रूह ना कांपती हो तो अपनी बच्ची के छलनी शरीर का इंतज़ार कीजिये…..उस दिन सब मायने रखेगा। तब तक कीजिये भारत माता की जय

Credit – Facebook Post of Deepali Tayday

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