समाजवाद से महाराणा प्रताप जयंती का सरोकार??

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महाराणा प्रताप राजपूत समाज के एक क्षत्रिय राजा थे जिन्होंने अपनी राजसत्ता के लिए मुगल शासकों से संघर्ष किया।यह महाराणा प्रताप जी का कर्तव्य था क्योंकि राज उन्हें ही भोगना था लेकिन महाराणा प्रताप जयंती और समाजवाद में क्या रिश्ता है?मुगलों और राजपूत राजाओं में वर्तमान सामाजिक/राजनैतिक परिदृश्य में कौन बहुजन समाज के लिए मुफीद है,हमारे बहस का केंद्र बिंदु यह है?

स्वभाविक है और सत्य भी कि जो भी राजघराने थे वे बहुतायत राजपूत थे।राजतन्त्र पूरी तौर पर मनु के विधान पर चलता था।रानी के पेट से राजा निकलता था।राजतन्त्र में वर्ण व्यवस्था का इंतजाम ही प्रभावी था।ब्राह्मण का काम पढ़ना,पढ़ाना,मंत्री बन राजा को परामर्श देना और राजपुरोहित बन पूजा-पाठ करवाना था तो क्षत्रिय का काम राज करना, युद्ध करना था।वैश्य ब्यापार करता था तो शेष लोग सछूत/अछूत शूद्र बन शिक्षा से दूर श्रम साध्य कार्यो को करने में तल्लीन रहते थे।यही राजतन्त्र का इंतजाम था।

राणाप्रताप ने मुगलों के आने के बाद अपनी मेवाड़ की राजसत्ता बचाने हेतु युद्ध किया,इस नाते उन्हें इतिहास में याद किया जाता है लेकिन भारतीय जातीय इंतजाम में इस देश के 85 फीसद आबादी के हित मे उनका योगदान क्या था,यह विचारणीय है?यदि वे मेवाड़ के शासक रहते तो उनके शासक रहने से उनकी राजपूत जाति तो शासक कौम रहती पर शेष वंचितों को क्या मिलता क्योकि वंचितों के लिए तो राजतन्त्र में यही था कि – “कोउ नृप होहि हमे का हानि,चेरी छाड़ि ना बनिबे रानी।’

मुगल हमारे देश मे आये विदेशी बन कर किन्तु हो गए पूर्णरूपेण भारतीय।वे बाहर से आकर भारत की मिट्टी में रच-बस गए।उन्होंने यहां के जातीय व्यवस्था को चोटिल किया,राजतन्त्र की हिंदूवादी क्रूर सामंती इंतजामात को मिटाने की कोशिश की।मदरसे खोल सबको पढ़ने का इंतजाम किया।भूमि सुधार सहित तमाम सड़क,सराय आदि बनवाये।जन सुविधाओ का इंतजाम किया।एक से एक ऐतिहासिक धरोहरों को दिया।इनके पराजित होने के बाद अंग्रेज आये तो वे देश से लूट करके बहुत कुछ इंग्लैंड ले गये पर उन्होंने रेल,सड़क,न्याय व्यवस्था,शिक्षा,कल-करखाने आदि लगाए/बनाये और मनुवादी इंतजामो को मिटाने की जद्दोजहद की।

हम यह निःसंकोक स्वीकार करते हैं कि यदि इस देश मे मुगल व अंग्रेज न आये होते और महाराणा प्रताप के वंशज ही राज कर रहे होते तो ये अखिलेश यादव,मायावती,लालू,नीतीश,करुणानिधि आदि मुख्यमंत्री या मंत्री बनने की बजाय अपने जातिगत पेशे में सन्नद्ध रहते लेकिन शुक्र मनाइए मुगलों व अंग्रेजो का कि वे भारत मे कथित विदेशी आक्रमणकारी बनकर आये लेकिन भारत की 85 प्रतिशत आबादी को सामाजिक गुलामी से मुक्त होने का राह बना दिये और हमे आज लोकतंत्र प्राप्त हुआ है।

महाराणा प्रताप जयंती का समाजवाद से क्या सरोकार?

समाजवाद से सरोकार लोहिया,जयप्रकाश,नरेन्द्रदेव,राजनारायण,अरुणा आसफ अली,एसएम जोशी,मधुलिमये,मधु दण्डवते,अच्युत पटवर्द्धन,रवि राय, किशन पटनायक,मामा बालेश्वर दयाल,रामसेवक यादव,कर्पूरी ठाकुर,रामनरेश यादव,वीपी मण्डल,जनेश्वर मिश्र,बृजभूषण तिवारी,मोहन सिंह,बद्री विशाल पित्ती,मुख्तार अनीस,चम्पा लिमये सहित बुद्ध, कबीर,रैदास,नानक,छत्रपति शाहू जी,पेरियार,ललई सिंह यादव,फुले,सावित्री बाई फुले,गाडगे,नारायणा गुरु,अम्बेडकर,कांशीराम,जगदेव प्रसाद कुशवाहा,महाराज सिंह भारती, रामस्वरूप वर्मा आदि से हो सकता है।

समाजवादी क्षत्रिय यदि कोई हो सकता है तो वह वीपी सिंह हो सकते हैं जिन्होंने चाहे जिन परिस्थितियों में सही,मण्डल लागू कर देश मे केवल यादव ही नही बल्कि लाखो पिछडो को कलक्टर से लेकर चपरासी आदि बना दिया।

महाराणा प्रताप के कुल-खानदान के आज मुख्यमंत्री योगी जी हैं लेकिन उन्होंने उनकी जयंती नही मनाई,उनकी जयंती पर घोषित छुट्टी खत्म कर डाली।क्या यह सही नही है कि आज सम्पूर्ण राजपूत समाज अपवाद छोड़ करके योगी जी के प्रति आस्थावान है फिर हमें कौन सा सामाजिक न्याय या राजनैतिक हित महाराणा प्रताप जयंती मनाने में दिख रहा है?

हम महाराणा प्रताप जयंती मनाएं या परशुराम जयंती पर यह शाश्वत सत्य है कि समाजवाद के खांचे में न बड़ी जातियॉ कभी बैठी हैं और न बैठेंगी।जब सोशलिस्ट पार्टी का नेतृत्व एसएम जोशी,अच्युत पटवर्द्धन,मधु लिमये,मधु दण्डवते सहित ब्राह्मण नेतृत्व के हाथों में था तो भी इनकी कम्युनिटी ने कभी भी सोशलिस्ट पार्टी को वोट नही दिया क्योकि उन्हें पता था कि समाजवाद का मतलब ही सामाजिक न्याय होता है।सामाजिक न्याय लागू करने का मतलब सवर्ण वर्चस्व का लोप होता है इसलिए वे क्यो रहे आपके साथ?

समाजवाद को भाष्य करने के लिए लोहिया जी ने जो कुछ जाति व धर्म पर लिखी और कही है वह पर्याप्त है समझने के लिए कि भारत मे जातिगत इंतजामात और धार्मिक कट्टरता को खत्म किये बिना सोशल जस्टिश का सपना अधूरा ही रहेगा।सामाजिक न्याय की अवधारणा को मूर्त रूप देने के लिए जाति और धर्म को पढ़ना व लोहिया जी के वैचारिक आंदोलन को समझना होगा।

सोशलिस्ट पार्टी के हमारे समस्त सवर्ण पुरखो ने कभी भी परशुराम जयंती या महाराणा प्रताप जयंती में सोशल जस्टिश या सेक्युलरिज्म नही तलाशा और न ही ऐसे आयोजनों को महत्व दिया लेकिन आज जब पूरा पिछड़ा/बहुजन हिंदुत्व परस्ती की तरफ अग्रसर है हमारी भी सक्रियता उस हिंदुत्ववादी पृष्ठभूमि को मजबूत करने वाली व बहुजन,सामाजिक न्याय व सेक्युलर धारा के इतर चलने वाली हो रही है जो तात्कालिक तौर पर नुकसानदेह भले ही न लगे पर दूरगामी परिणाम इसके समाजवाद के इतर ही आने वाले हैं।

महाराणा प्रताप या परशुराम महाराज सामंतवाद,शोषण व मनुवाद के प्रतीक हैं।सहारनपुर की घटना गवाह है कि महाराणा प्रताप जयंती के बहाने एक दलित सचिन वालिया को गोली मार करके मौत के घाट उतार दिया गया है।

एक तरफ हम दलित-पिछड़ा-अल्पसंख्यक गठजोड़ भी कर रहे हैं और दूसरी तरफ दलित-पिछड़ा-अल्पसंख्यक समाज के सामाजिक हितों को क्रूरता पूर्वक रौंदने वालों के आइकन्स को महिमामण्डित भी कर रहे है यह समाजवादी धारा या समाजवादी पार्टी के हित मे नही है।हमे 85 प्रतिशत बहुजन समाज को सहेजने और लोहिया/अम्बेडकर के आदर्शों को आत्मसात करने की जरूरत है और इसी में हमारा सामाजिक/राजनैतिक हित व वर्गीय चेतना जागृति का मंत्र है।

Facebook post – चंद्र भूषण सिंह यादव



	

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