सत्ता के गलियारों से बहुजन गायब; केंद्र में तैनात 81 सचिवो में सिर्फ 5 एससी-एसटी और शून्य औबीसी

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एक आरटीआई से पता चला है कि केंद्र सरकार में तैनात 81 सचिव स्तर के अधिकारियो में सिर्फ दो अनुसूचित जाति और तीन अनुसूचित जनजाति वर्ग से आते है। वहीँ 75 एडिशनल सचिव स्तर के अधिकारियो की लिस्ट में सिर्फ 6 अनुसूचित जाति और 4 अनुसूचित जनजाति के अधिकारियो के नाम है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है केंद्र में एक भी औबीसी अधिकारी सचिव या एडिशनल सचिव स्तर पर न्युक्त नहीं है।

ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल दा प्रिंट द्वारा दायर की गयी आरटीआई से ऐसे चौकाने वाले आकड़े सामने आये है। केंद सरकार में उच्च स्तर के नौकरशाही में कुल 495 सचिव, एडिशनल सचिव और संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी है जिसमे से सिर्फ 40 एससी -एसटी और 13 औबीसी समुदाय से आते है।

कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन विभाग के केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने पिछले साल संसद में एक जवाब देते हुए बताया था कि तब केंद्र सरकार में सिर्फ 4 एससी-एसटी सचिव थे।

गौरमतलब है कि केंद्र सरकार में डेपुटेशन पर अधिकारियो की नियुक्ति प्रक्रिया में जाति के आधार पर कोई रिजर्वेशन नहीं है पर सरकार कहती कि नियमो के ना होने के बावजूद वो एससी -एसटी वर्ग के अधिकारियो का चयन करने के लिए स्पेशल कदम उठाती है। पर सरकार कितनी कोशिश करती है ये आरटीआई से सामने आये आंकड़े से पता चल जाता है।

अगर 2011 के जनसख्या के आंकड़ों को देखे तो भारत में 20.14 करोड़ अनुसूचित जाति के लोग रहते है जो भारत की कुल जनसख्या का 16.6 प्रतिशत है। वहीँ अनुसूचित जनजाति भारत की कुल जनसख्या का 8.6 प्रतिशत है।

एससी-एसटी नौकरशाहों के साथ जातिगत भेदभाव

सिविल सेवा में जातिगत आरक्षण के कारण दलित और आदिवासी अधिकारियो की नौकरशाही में प्रवेश तो हो जाता है पर हमेशा ही उनको सिस्टम में भेदभाव सहना पड़ता है। अक्सर काबिल होने के बावजूद उन्हें रक्षा और वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभाग से दूर रखा जाता है।

न्यूज़ 18 के लिए एक लेख में वरिष्ठ आईएएस डॉ राजा शेखर वुंडरू लिखते है कि बहुत बार वरिष्ठ नौकरशाहों को प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष तरीको से सिस्टम में जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है। जातिगत भेदभाव का सबसे आम तरीका है अम्बेडकर से सम्बंधित चीज़ो को नष्ट करके आपको आपकी जगह का एहसास करवाया जाता है।

पूर्व आईएएस अधिकारी पी शिवकामी

पूर्व आईएएस अधिकारी और लेखक पी शिवकामी ने 2016 में रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद मीडिया को अपने खुद के साथ हुए जातिगत भेदभाव के बारे में बताया था। उन्होंने बताया कि 2008 में उन्होंने नौकरशाही को छोड़ दिया था क्यूंकि उनके साथ सरकार में अछूत जैसा व्यवहार किया जाता था।

पी शिवकामी नौकरशाही छोड़ते समय तमिलनाडु सरकार में आदिवासी कल्याण विभाग में सचिव थी पर खुद के साथ हुए जातिगत भेदभाव के बारे में बताती है कि “पूरा राजनितिक तंत्र और नौकरशाही दलितों के विरुद्ध काम करती है, मेरा पद राज्य के मंत्री के बाद सबसे ऊँचा था पर आदिवासियों के अधिकारों के लिए उन्हें दर दर भटकना पड़ता था।”

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