सफाई कर्मचारी दिवस पर देश के शहीदो को सलाम

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आज पुरे देश में सफाई मजदुर दिवस मनाया जा रहा है। आज के ही दिन शहीद भूपसिंह को पंचकुइयाँ बाल्मीकी मंदिर पर एक आंदोलन में उन्हें गोली लगी  थी जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गयी थी। भूपसिंह के नाम पर ही वाल्मीकी समाज के लोग सफाई मजदुर दिवस मानते है।

आज़ादी के इतने साल बाद भी एक खास वर्ग के लोग मानव मल ढोने पर मजबूर हैं,सरकार और सफाई कर्मचारी आयोग सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने की बात करते हैं। पर यह आज तक नहीं हुआ, क्योंकि सरकार की यह पहल सिर्फ सरकारी कागजो पर ही असलियत में नहीं, आपकी हमारी गंदगी साफ करने वाले हम जैसे ही इंसानो की जान कितनी सस्ती है। हर साल न जाने कितने लोग इन गटरों में अपनी जान गँवा देते है। और सरकार कुछ नहीं करती।

2014 से अब तक 1000 सफाई कर्मचारी की जान गई है।अभी कुछ दिनों पहले तक 100 दिन में 35 लोगो की जान गयी है। सीवर या गटर का नाम आते ही आप नाक सिकोड़ लेते होंगे। लेकिन हर साल हज़ारों लोग जाम सीवर की मरम्मत करने के दौरान दम घुटने से मारे जाते हैं। हर मौत का कारण ये  गटर है।

डॉ कौशल पवार कहती है आज़ादी के इतने बरस बीत जाने के बाद भी एक ख़ास वर्ग के लोग मानव मल ढोने पर मजबूर हैं और सेप्टि टैंक में मौत के घाट उतार दिये जाते है। उन्हें भी अपनी जान की परवाह कहाँ रहती है। पेट की भूख सब कुछ करवाती है जनाब। कई निज़ाम बदलते पर इनकी सुरक्षा और ज़िम्मेदारी न सरकारों को लेनी थी और न ली गयी। आज भी ये वही खड़े है जहाँ पर थे। दुनियाँ बदली पर ये क़ौम इस पेशे को नहीं छोड़ पायी। जिसने भी अपने इन घृणित पेशों को छोड़ा वह समाज आगे निकल गया।

लाइलाज बिमारियों के शिकार

सीवर की गंदगी से उन्हें लाइलाज बिमारियां हो जाती है जो आखिर में उन्हें मौत के मुंह में ले जाती है। सीवर में काम करने वाले सफाई कर्मचारी को इलाज की सुविधा भी नहीं मिल पाती है।  सफाई कर्मचारी को पैनेल के तहत अच्छे हॉस्पिटल भी नहीं मिल पाते है।  पैनेल के तहत भी कॅश लेस नहीं हो पाता जिसके कारण इन कर्मचारी का इलाज़ नहीं हो पाता है। इन सफाई कर्मचारियों को बिना किसी तकनीक या यंत्र के गटर में शरीर पर सरसों का तेल लगाकर गटर में सफाई करने उतारा जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि समय बीते के साथ-साथ वे कई तरह की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।

हेल्थ और इंश्योरेंस की कोई सुविधा नहीं

सफाई कर्मचारी के लिए कोई भी एक ऐसी योजना नहीं है जो सफाई कर्मचारी के स्वास्थ का  इंश्योरेंस करे।

सुप्रीम कोर्ट की सुनने वाला कोई नहीं

सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि सीवर की सफाई के लिए केवल मशीनों का ही उपयोग किया जाना। सफाई के लिए कर्मचारियों का सीवर में उतरना पूर्णरूप से प्रतिबंधित है। वर्ष 2000 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी सीवरों की सफाई करने वाले कर्मचारियों को सीवर सुरक्षा उपकरण देने के लिए दिल्ली जल बोर्ड को निर्देश दिए थे। लेकिन हाल ये तस्वीर सच बयां करने के लिए काफी है।

आखिर क्यों होती है सफाई कर्मचारी की मौत
सफाई कर्मचारी की ज्यादातर मौत घटना स्थल पर ही होती है इसका कारण है की काम के दौरान उन्हें सुरक्षा उपकरण मुहैया नहीं कराया जाता है।  हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी सफाई कर्मचारी को फुल सूट जैकेट नहीं दिया जा रहा है।

इसका कारण  यह भी है की आज कल सरकार सारे काम ठेका पर दे रही है और जब किसी सफाई कर्मचारी की मौत घटना स्थल पर होती है तो सरकार कहती है की हमने यह काम ठेका पर दिया था हमारी जिम्मेदारी नहीं है।  पर वही दूसरी तरफ सुप्रीमकोर्ट का कहना है कि यह भी सरकार की जिम्मेदारी है सरकार पीछे नहीं हट सकती।
देश भर में 27 लाख सफाई कर्मचारी। जिसमें 7,70000 सरकारी सफाई कर्मचारी और 20 लाख सफाई कर्मचारी ठेके पर काम करते हैं।

शिक्षा का आभाव

सफाई कर्मचारीयो की सबसे बड़ी समस्या यह भी है की उनके बच्चो को उचित शिक्षा नहीं मिल पा रहा है जिसके कारण इनके बच्चे बड़े हो कर अपने माँ बाप के कामो में अपना सहयोग देते है और यह परंपरा चलती रहती है।

• औसतन सफाईकर्मी की कमाई 3 से 5 हजार रुपये महीने ।

• 20 लाख लोग सीवर और गटर साफ करने में लगे हैं।

•90 फीसदी गटर-सीवर साफ करने वालों की मौत 60 बरस से पहले।

• 60 फीसदी सफाईकर्मी कॉलरा, अस्थमा, मलेरिया और कैंसर से पीड़ित।

• 8 सफाई कर्मचारियों की मौत हर घंटे होती है।

• हेल्थ और इंश्योरेंस की कोई सुविधा नहीं।

• 13 लाख कर्मचारी मल-मूत्र साफ करने वाले।

हमारे देश में कचड़े, नाली, बाथरूम, बारिश सभी का पानी एक ही जगह जाता है और हम आप में से कोई भी एक बार नहीं सोचता की हम एक आदमी को इतने गंदे पानी में कैसे भेज सकते है।

जनसंघर्ष की टीम की तरफ सफाई कर्मचारी के बलिदानो को सलाम

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