आरएसएस का दलित प्रेम विरोधाभास – कँवल भारती

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यह दिलचस्प है कि आरएसएस जातिव्यवस्था का समर्थन करता है, परन्तु छुआछूत का विरोध करता है. वह दलितों के मंदिर-प्रवेश का भी समर्थन करता है. अभी कुछ माह पहले देहरादून में आरएसएस के एक नेता अछूतों को मन्दिर-प्रवेश कराने ले भी गए थे, और असफल हुए थे.

आरएसएस डा. आंबेडकर की जयंतियां भी जोरशोर से मना रहा है. सवाल यह है कि यह विरोधाभास क्यों है? जातिवाद और दलित-प्रेम एक साथ कैसे चल सकता है? लेकिन आरएसएस के हिन्दू चिंतन से यह सारा संघ-जाल समझ में आ जाता है. और सिर्फ यह ही नहीं, उसका धर्मान्तरण-विरोध, घरवापसी, लवजिहाद और दलितों की विचार-शुद्धि का इतिहास-लेखन भी समझ में आ जाता है

 इसके पीछे कोई सद्भाव का विचार नहीं है, न दलितों से भाईचारे का विचार है, और न उनको हिन्दुत्व से जोड़ने का विचार है. फिर क्या विचार है? असल में रहस्य यह है कि आरएसएस दलितों को ईसाईयों और मुसलमानों से दूर रखना चाहता है, और इसलिए दूर रखना चाहता है, क्योंकि उसे हिन्दुओं के अल्पसंख्यक होने का खतरा सताता है. उसे यह भय है कि दलित अगर मुसलमान बन गए, तो वे बहुसंख्यक हो जायेंगे, और हिन्दू अल्पसंख्यक बन जायेंगे, जिस तरह वे कश्मीर में हैं. इससे उसका हिन्दूराष्ट्र खतरे में पड़ जायेगा.

अत: अल्पसंख्यक बनने का खतरा ही आरएसएस को दलितों और आंबेडकर के करीब लाता है. इसके सिवा उसे इन दोनों से कोई लगाव नहीं है.

(कँवल भारती)

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