सोशल मीडिया पर SC/ST के खिलाफ जातिसूचक निजी राय भी दण्डनीय

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दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार (03 जुलाई ) को एक फैसला सुनते हुए कहा कि सोशल मीडिया (फेसबुक) पर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजातियों समुदाय के खिलाफ किया गया कोई भी पोस्ट या टिप्पणी सजा का कारण बन सकती है। कोर्ट ने कहा, ऐसी कोई भी टिप्पणी ऑनलाइन अब्यूज में शामिल की जाएगी।

‘ऑनलाइन एब्यूज़’ और ‘ट्रोलिंग’ के बढ़ते मामलों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह फैसला लिया है। कोर्ट ने कहा कि इस बात से सजा कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि पोस्ट लिखने वाले ने अपनी प्राइवेसी सेटिंग को पब्लिक या प्राइवेट कर रखा है। अगर किसी की गैर मौजूदगी में भी किसी जाति विशेष का अपमान किया गया है तो इसपर SC/ST एक्ट लागू होगा।

जस्टिस विपिन संघी ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि जब भी कोई यूजर अपना फेसबुक अकाउंट चलता है तो और अपने फेसबुक कि सेटिंग ” निजी ” से “सार्वजनिक” करता है तो फेसबुक पर किया गया पोस्ट, तस्वीर सभी के लिए सार्वजनिक हो जाता है। कोर्ट को इसे कोई फर्क नहीं पड़ता की यूजर ने अपने अकाउंट की सेटिंग क्या है अगर कोई भी यूजर आपत्ति जनक पोस्ट करता है तो उस पर धारा 3 (1) (x) के तहत कार्यवाई हो सकती है और उसे दंड का भागीदार माना जाएगा।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर के अनुसार अगर सोशल मीडिया पर किसी अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्ति की ग़ैरमौजूदगी में भी उसके ख़िलाफ़ आपत्तिजनक बात कही जाती है तो उस मौक़े पर भी मुद्दा इस अधिनियम के दायरे में आता है।

हफ़्फिंगटन पोस्ट की एक खबर के अनुसार कोर्ट ने कहा कि अगर किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय के व्यक्ति को निशाना बनाकर कर कोई सोशल मीडिया पर पोस्ट डालेगा तो ये कृत्य दण्डनीय होगा पर अगर किसी व्यक्ति विशेष की बजाये पुरे समुदाय पर निशाना लगाया गया तो यह नियम लागु नहीं होगा। हालाँकि कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर आरोपी और शिकायतकर्ता एक दूसरे से सम्बंधित है तो यह नियम लागु नहीं होगा। कोर्ट ने एक आरोपी राजपूत महिला के ख़िलाफ़ एफआईआर को ख़ारिज कर दिया।

दैनिक जागरण की ख़बर के अनुसार जस्टिस विपिन सांघी ने कहा कि यदि कोई फेसबुक यूजर अपनी सेटिंग को ‘प्राइवेट’ से ‘पब्लिक’ करता है, इससे जाहिर होता है कि उसके ‘वॉल’ पर लिखी गई बातें न सिर्फ उसके फ्रेंड लिस्ट में शामिल लोग देख सकते हैं, बल्कि अन्य फेसबुक यूजर्स भी देख सकते हैं. हालांकि, किसी अपमानजनक टिप्पणी को पोस्ट करने के बाद अगर प्राइवेसी सेटिंग को ‘प्राइवेट’ कर दिया जाता है, तो भी उसे एससी/एसटी ऐक्ट की धारा 3(1)(एक्स) के तहत दंडनीय अपराध माना जाएगा.

हाईकोर्ट ने ये फैसला एक अनुसूचित जाति की महिला की याचिका पर हो रही सुनवाई के बाद दिया. मामले में महिला का आरोप दूसरी राजपूत महिला पर था जिसने अपनी फ़ेसबुक ‘वॉल’ पर एक पोस्ट में ‘धोबी’ के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया. ये दोनों महिला एक ही परिवार से हैं. शिकायतकर्ता की वकील नंदिता राव ने कोर्ट से कहा कि आरोपी ने एससी/एसटी ऐक्ट के तहत अपराध किया है. राजपूत महिला ने जानबूझ कर अपनी दलित भाभी का अपमान करने के लिए फेसबुक पर पोस्ट किया था. वहीं राजपूत महिला ने अपने बचाव में ये दलील दी कि उसकी फेसबुक ‘वॉल’ उसका ‘निजी स्पेस’ है . इसका मकसद किसी को ठेस पहुंचाना नहीं था.

आरोपी ने यह दलील भी दी कि उसके पोस्ट में उसने कभी अपनी भाभी का जिक्र नहीं किया. देवरानी ने कहा कि उसने धोबी समुदाय की महिलाओं को लेकर पोस्ट लिखी थी, न कि किसी खास व्यक्ति के लिए. कोर्ट ने राजपूत महिला के ख़िलाफ़ एफआईआर को ख़ारिज करते हुए फ़ेसबुक को निजी स्पेस मानने से इनकार कर दिया है दिल्ली उच्च न्यायालय के इस फैसले के दायरे में वॉट्सऐप चैट जैसे अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म भी आ सकते हैं।

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