प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय द्वारा निलंबित बहुजन प्रोफेसरो का भविष्य फंसा बीच मँझदार

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प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय द्वारा ‘असंतोषजनक प्रदर्शन’ का हवाला देकर निकाले गए दो बहुजन प्रोफ़ेसर की समस्याए खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। पिछले महीने कलकत्ता हाई कोर्ट ने इनके निलंबन पर अंतरिम रोक लगा दी पर जब दोनों सहायक प्रोफेसर अदालत के फैसले की कॉपी लेकर दुबारा नौकरी करने गए तो उनके साथ अपमानजनक व्यव्हार किया गया और विश्वविद्यालय प्रशासन ने कलकत्ता हाई कोर्ट के बड़ी बेंच पर अपील कर दी। जिसके बाद दो जजो की बेंच ने फैसला किया कि जबतक हाईकोर्ट इस मामले में अपना अंतिम फैसला नहीं दे देगा तब तक विश्वविद्यालय का निलंबन आर्डर अमान्य होगा परन्तु दोनों सहायक प्रोफेसर भी अपने पद पर पूरी तरह से नियुक्त नहीं हो पाएंगे। कलकत्ता हाई कोर्ट के इस फैसले से हिंदी विभाग के ये दोनों सहायक प्रोफेसर अब मजधार में फंस गए है।

डॉ अनिल पुष्कर दलित समाज से आते है और उन्होंने जेनयू से अपनी पीएचडी की। वे प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय ज्वाइन करने से पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पोस्ट डॉक्टरेट कर रहे थे। प्रोफेसर सत्यदियो प्रसाद पिछड़े वर्ग से आते है जिन्होंने अपनी पीएचडी दिल्ली यूनिवर्सिटी से की है और उनको लगभग दस साल का पढ़ाने का अनुभव है। दोनों शिक्षकों ने बताया के उन्होंने प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय को अपने पुराने वेतन से कम होने के बावजूद यहाँ पर ज्वाइन कर लिया। हमको लगा कि यह 200 वर्ष पुराना शिक्षा का केंद्र एक बहुत ही प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है इसलिए हमने कम वेतन के बावजूद यहाँ ज्वाइन कर लिया।

प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के दोनों शिक्षकों को विभाग ने असंतोषजनक प्रदर्शन का हवाला देते हुए उनके एक साल के प्रोबेशन अंतराल के खत्म होने से एक महीने पहले ही तुरंत प्रभाव से बर्खास्त कर दिया था। डॉ अनिल पुष्कर और डॉ सत्यदियो प्रसाद को 21 अप्रैल को सायं 4 बजे एक पत्र मिला जिसमे लिखा था कि असंतोषजनक प्रदर्शन होने के कारण उनकी सेवाएं तुरंत प्रभाव से खत्म कर दी गयी है। डॉ अनिल पुष्कर बताते है कि पत्र पढ़ते ही लगा जैसे हमारे पैरो तले जमीन खिसक गयी हो, हम समझ ही नहीं पाए यह क्या हो गया।

हिंदी विभाग का कहना है कि उन्होंने छात्रों की शिकायत के बुते ही ये निलंबन की करवाई की।

जनसंघर्ष की टीम ने जब हिंदी विभाग के छात्रों से बात की तो पता चला कि 24 अप्रैल सोमवार को जब विभाग में छात्रों को पता चला कि दो शिक्षकों को बर्खास्त कर दिया गया है तो छात्रों ने बहुत विरोध किया। लगभग 100 छात्रों ने इस निलंबन के खिलाफ एक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया, परन्तु विश्वविद्यालय प्रशासन ने किसी की एक भी नहीं सुनी। बल्कि छात्रों के इस ज्ञापन को स्वीकार करने की बजाये हिंदी विभाग की प्रमुख प्रोफेसर तनूजा मजूमदार ने छात्रों को डराया कि जो मर्जी अभियान चला लो कुछ नहीं होगा और उल्टा छात्रों को ही उनका भविष्य ख़राब करने की धमकी देने लगी।

 

जनसंघर्ष को प्राप्त दस्तावेजों से पता चलता है की कम से कम दो छात्रों ने हिंदी विभाग की प्रमुख प्रोफेसर तनूजा मजूमदार के खिलाफ मानसिक प्रताड़ना की शिकायत तक कर दी ।

एक छात्र ने अपना नाम न प्रकाशित किये जाने की शर्त पर जनसंघर्ष की टीम को बताया कि आप सोचिये किसी छात्र पर क्या बीतेगी जब वो अपने शिक्षक को रोते हुए देखेगा। उस दिन अपने शिक्षक को रोते देख बहुत छात्रों को बुरा लगा।

डॉ सत्यदियो प्रसाद ने कहा कि हमने अपनी गलती जानने की हर संभव कोशिश की, प्रसाशन के सामने गिड़ गिड़ाये, आखिर हमसे कहाँ चूक हो गयी क्योंकि हमारी पढ़ाने की शैली थोड़ी अलग है और छात्र हमको बहुत पसंद करते है। हमने हिंदी विभाग की प्रमुख प्रोफेसर तनूजा मजूमदार से, रजिस्ट्रार से, कुलपति से, शिक्षा  मंत्री से, मुख्यमंत्री से, राज्यपाल से और न जाने कहाँ कहाँ अपनी याचिका भेजी पर कहीं से कोई जवाब नहीं मिला। अंत में बस अदालत ही हमारा आखिरी सहारा था वही हमने लिया।

निलंबन के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा अपमान और प्रताड़ना

डॉ सत्यदियो प्रसाद ने बताया कि उनके निलंबन के बाद विश्वविद्यालय द्वारा दिया गया आवासीय सुविधा के साथ साथ सभी अन्य प्रकार की सुविधाओं के इस्तेमाल को तुरंत बंद करने के लिए हमको धमकाया जाने लगा था। डॉ अनिल पुष्कर ने बताया कि हमने प्रसाशन से आग्रह भी किया कि उनको कुछ महीनो का समय दिया जाए । परन्तु प्रसाशन ने उनकी सभी अपील को नज़र अंदाज़ कर दिया।

डॉ अनिल पुष्कर ने बताया कि जब पिछले महीने कलकत्ता हाई कोर्ट ने विश्वविद्यालय के निलंबन पर अंतरिम रोक लगा दी और हम लोग अदालत के फैसले की कॉपी लेकर दुबारा नौकरी करने गए तो हमारे साथ अपमानजनक व्यव्हार किया गया। रजिस्ट्रार ने हमको बिठाये रखा और हमसे अदालत के फैसले की को रिसीव तक नहीं किया। जब हमारी सब उम्मीद खत्म हो गयी तो हमने  फैसले की कॉपी को रजिस्टर्ड पोस्ट से प्रसाशन को भिजवा दिया।

डॉ अनिल पुष्कर ने बताया कि उनकी गैर मजूदगी में विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके फ्लैट से उनका सामान निकाल कर बाहर फेंक दिया।  इतना ही नहीं, प्रिंटर, सोफे सेट और विश्वविद्यालय द्वारा उनको दिया गया अन्य सामान भी ले गए। ना हमको किसी प्रकार की जानकारी दी गयी ना सामान लेने के बाद किसी तरह की रिसीविंग दी गयी। इस तरह के गैरकानूनी रवैये के खिलाफ हमने शिकायत भी दर्ज करवाया।

हिंदी विभाग प्रमुख तनूजा मजूमदार पर प्रताड़ना के आरोप

डॉ अनिल पुष्कर ने बताया कि उनको हिंदी विभाग की प्रमुख प्रोफेसर तनूजा मजूमदार द्वारा काफी मौको पर प्रताड़ित किया गया। उनका कहना है कि प्रोफेसर तनूजा मजूमदार बहुत बार मेरी क्लास के दौरान आकर विद्यार्थियों से सवाल जवाब करने लगती थी। उनका आरोप है कि हिंदी विभाग प्रशासन ने उनको प्रताड़ित करने के लिए उनके विषय के परिणामो को रोका और उनके विषय में छात्रों के नम्बरो को भी घटा दिया गया। “प्रोफेसर तनूजा मजूमदार बहुत बार छात्रों को भी डराती थी के अनिल पुष्कर के खिलाफ शिकायत करो वरना उनका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। ये सब उनकी जातिवादी मानसिकता की झलक है।” निलंबन के बाद प्रोफेसर अनिल पुष्कर ने राष्टीय अनुसूचित जाति आयोग को पत्र लिख कर प्रोफेसर तनूजा मजूमदार के खिलाफ जातिवादी भेदभाव की शिकायत की।

जनसंघर्ष की टीम ने जब हिंदी विभाग के छात्रों से बात की तो पता चला कि अक्सर जब भी विभाग में साप्ताहिक गोष्ठी होती थी तो प्रोफेसर तनूजा मजूमदार डॉ अनिल पुष्कर को टारगेट करते थे। उनके इस घिनोने कृत्य में दूसरे प्रोफेसर भी प्रोफेसर तनूजा मजूमदार का साथ देते थे। डॉ अनिल पुष्कर काफी कटे कटे रहते थे, और आजतक मैंने उनको दूसरे शिक्षकों के साथ लंच करते हुए नहीं देखा, वे हमेशा अपने रूम में अकेले ही खाना खाते थे।

डॉ सत्यदियो प्रसाद को अपने निलंबन पत्र से पहले कभी भी विभाग की तरफ से किसी प्रकार का कोई नोटिस या कोई शिकायत नहीं मिली। उन्होंने जनसंघर्ष से फ़ोन पर बताया कि उनको कभी ज्यादा समस्या नहीं हुई पर आखिरी दो महीनो में लोगो का हमारे प्रति व्यव्हार में बदलाव आने लगा। बहुत बार तो प्रोफेसर तनूजा मजूमदार हमारे अभिवादन तक का जवाब नहीं देती थी।

जनसंघर्ष को प्राप्त दस्तावेजों से पता चलता है कि हिंदी विभाग की प्रमुख प्रोफेसर तनूजा मजूमदार ने डॉ अनिल पुष्कर पर विद्यार्थियों को संभावित प्रश्न बताकर पेपर लीक करने का आरोप भी लगाया था और इसी सम्बन्ध में उनको एक कारण बताओ नोटिस भी दिया गया था। जिसके जवाब में डॉ अनिल पुष्कर ने लिखा कि उनके द्वारा तैयार किये गए प्रश्नपत्र में से एग्जामिनेशन मॉडरेशन बोर्ड ने 70 प्रतिशत प्रश्न बदल दिए गए थे तो उनपर लगाया गया यह आरोप गलत है। प्रोफेसर अनिल ने अपने ऊपर पाठ्यक्रम को समय पर पुरा नहीं करने के आरोप को भी बेबुनियाद बताया। कारण बताओ नोटिस में डॉ अनिल पुष्कर ने लिखा कि उनके खिलाफ एक साजिश रची जा रही है और विभाग के अंदर राजनीती का खेल खेला जा रहा है।

डॉ पुष्कर बताते है कि प्रोफेसर तनूजा मजूमदार का रवैया बहुत बार तानाशाही भरा रहा। उन्होंने बताया की कोर्ट में जब सुनवाई हुई तो विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से दाखिल एक रिपोर्ट के अनुसार पुरे हिंदी विभाग में सिर्फ वे ही एकमात्र ऐसे शिक्षक है जिनकी रिपोर्ट एक्सीलेंट है बाकि सभी सहायक प्रोफेसरो के प्रदर्शन की रेटिंग्स बेकार थी और अदालत में जज ने भी इस तथ्य पर गौर फ़रमाया।

जनसंघर्ष की टीम ने जब प्रोफेसर तनूजा मजूमदार की असीमित ताकत के पीछे की बात को समझने की कोशिश की तो यूनिवर्सिटी के कुछ सूत्रों से पता चला कि वे मानविकी और सामाजिक विज्ञान की डीन होने के साथ साथ बहुत सारी समितियों की सदस्य भी है। हिंदी विभाग में वे एकमात्र प्रोफेसर है बाकि सब असिस्टेंट प्रोफेसर है। प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर दी गयी जानकारी के अनुसार वे लगभग पिछले दस सालो से हिंदी विभाग के प्रमुख के पद पर काबिज़ है जो की काफी विचित्र है क्योंकि आमतौर पर हर दो साल में विभाग के प्रमुखों को बदल दिया जाता है। कुछ सूत्रों ने बताया कि प्रोफेसर तनूजा मजूमदार प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ अनुराधा लोहिया की काफी करीबी है।

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