प्रशासनिक विफलता थी और डॉक्टरों को बनाया जा रहा है बलि का बकरा, डॉ कफील ने जेल से लिखा पत्र

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“आठ महीने से जेल में यातना, अपमान के बाद भी आज सब कुछ मेरे यादों में जिंदा है. कभी-कभी मैं अपने आप से सवाल पूछता हूं क्या मैं सच मे दोषी हूं, तो दिल के गहराई से जवाब मिलता है नहीं, नहीं, नही.

डॉक्टर कफील खान ने 18 अप्रैल को जेल से एक खत लिखा उसके कुछ अंश

10 अगस्त को व्हाट्सएप पर जब मुझे खबर मिली तो मैं वो सब किया जो एक डॉक्टर, एक पिता और देश के एक ज़िम्मेदार नागरिक को करना चाहिए.

 मैंने सभी बच्चों को बचाने की कोशिश की, जो ऑक्सीजन के कमी के वजह से खतरे में थे. ऑक्सीजन की कमी के वजह से मासूम बच्चों को बचाने के लिए मैं अपने तरफ से पूरी कोशिश की.

मैंने सबको कॉल किया, विनती की, मैं भागा, मैंने ड्राइव किया,  मैंने ऑक्सीजन का आर्डर किया,  मैं रोया, मैंने वो सब कुछ किया, जो मुझसे हो सकता था. मैंने अपने HOD को कॉल किया, अपने दोस्तों को कॉल किया, BRD अस्पताल के प्रिंसिपल को कॉल किया, BRD के एक्टिंग प्रिंसिपल को कॉल किया, गोरखपुर के DM को फ़ोन किया और सबको ऑक्सीजन के कमी के वजह से अस्पताल में खड़े हुए गंभीर स्थिति के बारे में बताया. हज़ारों बच्चों  को बचाने के लिए मैं गैस सप्लायर के पास गिड़गिड़ाया भी.

मैंने उन लोगों कैश दिया और कहा कि सिलिंडर डिलीवर होने के बाद बाकी पेमेंट हो जाएगा. लिक्विड सिलिंडर टैंक पहुंचने तक हम 250 सिलिंडर जुगाड़ करने में सफल हुए. एक जंबो सिलिंडर का दाम 250 रुपया था.आसपास के अस्पताल से सिलिंडर लाने के लिए मैं खुद ड्राइव करके गया.

DIG के तरफ से तुरंत मदद की गयी. BRD अस्पताल से गैस एजेंसी तक खाली सिलिंडर टैंक पहुंचाने और इन्हें भरकर अस्पताल पहुंचाने के लिए एक बड़े ट्रक के साथ कई सैनिक तुरंत भेज दिए गए. वो लोग 24 घंटे तक इस काम मे लगे रहे.

लिक्विड ऑक्सीजन टैंक पहुंचने तक हम अपने कोशिश जारी रखे. 13 तारीख के सुबह मुख्यमंत्री योगी महाराज अस्पताल पहुंचे और मुझे पूछा क्या आप डॉक्टर कफील है और आप ने सिलिंडर जुगाड़ किये हैं तो मैंने “हां” में जवाब दिया. योगी गुस्से में आ गए और कहा कि आप को लगता है सिलिंडर जुगाड़ करने से आप हीरो बन जाएंगे. मैं इसे देखता हूं।

 

योगी जी इस घटना के मीडिया में आ जाने के वजह से गुस्से में थे. मैं अल्लाह  के नाम पर कसम खाकर कह रहा हूं कि किसी भी मीडिया को मैंने उस रात इन्फॉर्म नहीं किया था. मीडिया अपने आप वहां पहुंचा था.

लेकिन अब लगने लगा है कि न्यायपालिका भी दबाव में काम कर रही है ज़िंदगी सिर्फ मेरे लिए नहीं मेरे परिवार के लिए भी नरक और तुच्छ बन गया है. जस्टिस के लिए मेरे परिवार एक जगह से दूसरे जगह भाग रहा है. पुलिस स्टेशन से कोर्ट, गोरखपुर से इलाहाबाद लेकिन कोई फायदा नहीं हो रहा है. मेरी बेटी का पहला जन्मदिन मैं सेलिब्रेट नहीं कर पाया. अब वो एक साल और सात महीने की हो गयी है.

10 अगस्त को मैं छुट्टी पर था और (छुट्टी मेरे HOD ने सैंक्शन किया था) लेकिन फिर भी अपना ड्यूटी निभाने के लिए मैं अस्पताल पहुंचा. मैं अस्पताल का सबसे जूनियर डॉक्टर था. मैंने 8/8/2016 को अस्पताल जॉइन किया था. मैं NHRM में नोडल अफ़सर के रूप में काम करता था और padiatrics के लेक्चर के रूप छात्रों को पढ़ता था. मैंने कहीं भी सिलिंडर खरीदने,  टेंडर में, ऑर्डर, पेमेंट में शामिल नहीं था. अगर पुष्पा सेल्स ने सिलिंडर देना बंद कर दिया तो उस के लिए मैं कैसे ज़िम्मेदार हूं. मेडिकल फील्ड के बाहर के एक आदमी भी कह देगा कि डॉक्टर का काम इलाज करना है ना कि सिलिंडर खरीदना. दोषी तो गोरखपुर के DM, DGME, हेल्थ और एजुकेशन के  प्रिंसिपल सेक्रेटरी है क्योंकि पुष्पा सेल्स के द्वारा 68 लाख बकाया राशि पेमेंट करने के लिए 14 रिमाइंडर के बात भी कोई कदम नहीं उठाया गया.

यह ऊंच स्तर पर प्रशासनिक लेवल की बहुत बड़ी विफलता है. हम लोगों को बलि का बकरा बनाया गया और हम लोगों को जेल के अंदर डाला, ताकि सचाई गोरखपुर जेल में ही रह जाए. जब मनीष को बेल मिला, तो हमें भी लगा कि जस्टिस मिलेगा और हम अपने परिवार के साथ रहने के साथ-साथ दोबारा सेवा कर सकेंगे. लेकिन हम लोग अभी भी इंतज़ार कर रहे हैं. मैं उम्मीद करता हूं कि समय आएगा जब मैं फ्री हो जाउंगा और अपने बेटी और परिवार के साथ रहने लगूंगा. न्याय जरूर मिलेगा.

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