इस क्रूर समाज से जीत ना सकी एसिड अटैक पीड़ित चंचल पासवान

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बिहार की एसिड अटैक सर्वाइवर चंचल पासवान ने 22 जून को इस क्रूर समाज को अलविदा कह दिया। पटना के पास दानापुर के छितनामा गांव की चंचल एक बहादुर लड़की थी जिसने अपने उपर एसिड से हुए हमले और अन्याय के ख़िलाफ़ पांच साल तक लड़ाई लड़ी, लेकिन उसके अपराधियों को वो सज़ा नहीं मिल पाई जो मिलनी चाहिए थी।

चंचल के पिता शैलेश पासवान ने कहा कि वो आखिरी दम तक बहादुरी से लड़ती रही, लेकिन अब मैं हार गया हूं. मुझे अफसोस है कि मेरी बेटी को मैं न्याय नहीं दिला सका।

चंचल की छोटी बहन सोनम ने बताया की कुछ दिनों से लू (गर्म हवा) चलने की वजह से उसके घावो में काफी जलन हो रही थी जिसकी वजह से चंचल को बहुत तेज भुखार आया जिसके बाद उसे इंदिरा गांधी चिकित्सा विज्ञान संस्थान (IGIMS) में ले जाया गया जहा डॉक्टरों ने उसे मर्त घोषित कर दिया।

अनपढ़, गरीब मजदूर परिवार की इस बेटी की सपना था कम्प्यूटर इंजीनियर बनना, वो कम्प्यूटर कोर्स भी कर रही थी. वो और उसकी बहन सोनम दोनों शिद्दत से शिक्षा के जरिए अपनी जिंदगी के अंधेरे को दूर करने में लगे थी. वो पढ़ना चाहती थी लेकिन बिहार के समाज में एक दलित लड़की का पढ़ना लिखना और आगे बढ़ना शायद किसी को गवारा नहीं था।

मौहल्ले के चार लड़कों के लिए तो वो सिर्फ एक लड़की, एक जवान शरीर था। एक दलित लड़की का इस तरह आगे बढ़ना किसी को गवारा नहीं था लेकिन रोज-रोज की छींटाकशी, ताने और छेड़खानी को सहते हुए भी चंचल को आगे बढ़ने की जिद थी। एक लड़के ने उसे साथ भाग जाने को कहा, उसने मना कर दिया क्योंकि वो पढ़ना चाहती थी। चंचल को शायद यह नहीं पता था की उसकी ये एक ना उसकी ज़िन्दगी बर्बाद कर देगी।

2012 में अक्टूबर की हल्की सर्द रातों में दुर्गा पूजा के उत्सव की गर्माहट महसूस हो रही थी. 21 अक्टूबर की रात जब वो अपने घर की छत पर बहन सोनम के साथ सो रही थी तो वो चारों लड़के आए और दो ने उसके हाथ पैर पकड़े, मुंह दबाया और एक ने बोतल से निकाल कर कटोरे में भर कर उस पर एसिड उंडेल दिया। चंचल के चिल्लाने की आवाज़ से सुनकर जब मां सुनयना और पिता शैलेश जब तक छत पर भागे तो देखा, चंचल बुरी तरह छटपटा रही थी। उसके चेहरे से धुंआ निकल रहा था और दूसरी बहन सोनम का भी हाथ और सीना जख्मी हो गया था। चंचल के माँ बाप को समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ? पिता मदद के लिए मोहल्ले की तरफ भागे लेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आया।

चंचल और उसके परिवार ने लम्बी लड़ाई। चंचल की बहन का कहना है कि एसिड पीड़ित को सरकार 3 लाख रुपए की मदद देती है पर हमे सिर्फ एक लाख रुपए मिले है। साथ ही उच्चतम न्यालय ने ये भी कहा कि पीडितो के पूरे इलाज का ख़र्च सरकार उठायेगी और उनके पुर्नवास में मदद करेगी और साथ ही कोई भी प्राइवेट हस्पताल किसी भी एसिड पीड़ित को इलाज से इनकार नही कर सकता, उसको उसका इलाज और दवाइयो का खर्चा उठाना होगा।

आखिर कब तक लड़कियों को पढ़ने लिखनी की सजा मिलगी या किसी लड़के को ना कहने की सजा हम इतना तो कोशिश कर सकते है कि अब फिर किसी लड़की को चंचल की तरह ना गुजरना पड़े .फिर कोई चंचल नहीं बने. याद रखिए, चंचल पासवान हमेशा दूसरे या पड़ोसी के घर की लड़की नहीं होती वो आपके घर में भी हो सकती है।

जनसंघर्ष की तरफ से चंचल को श्रद्धांजलि।

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