भीमराव अम्बेडकर की संकल्प भूमि

बड़ौदा नरेश सयाजी राव गायकवाड़ से करार के अनुसार सन 1917 के सितंबर महीने के दूसरे सप्ताह में बाबासाहब अम्बेडकर…

बड़ौदा नरेश सयाजी राव गायकवाड़ से करार के अनुसार सन 1917 के सितंबर महीने के दूसरे सप्ताह में बाबासाहब अम्बेडकर अपने अग्रज बंधु के साथ बड़ौदा गए, हालाकि सयाजी राव ने डा.अम्बेडकर को स्थानक से लाने की व्यवस्था का आदेश पहले ही जारी कर दिया था, परंतु एक अस्पृश्य को लाने के लिए कोई तैयार नही हुआ, फलस्वरूप बाबासाहब स्वतः ही व्यवस्था कर पहुंच गए

बड़ौदा में बाबासाहब को रहनें और खाने की व्यवस्था स्वतः ही करनी थी, परंतु यह बात बड़ौदा में जंगल की आग की तरह पहले ही फैल गयी थी कि मुम्बई से एक महार युवक बड़ौदा के सचिवालय में नौकरी करने आ रहा है, फलस्वरूप किसी भी हिन्दू रेस्टोरेंट या धर्मशाला में विद्वान डा.अम्बेडकर को रहने का सहारा नहीं मिला, आखिर उन्होंने अपना नाम बदलकर बताया तब उन्हें एक पारसी धर्मशाला में जगह मिली

बड़ौदा नरेश गायकवाड़ को डा.अम्बेडकर को वित्तमंत्री बनाने की प्रबल इच्छा थी पर अनुभव न होने की वजह से बाबासाहब नें सेना के सचिव पद को ही स्वीकार किया.

सचिवालय में डा.अम्बेडकर को अस्पृश्य होने के कारण बहुत बेइज्जती का सामना करना पड़ा उन्हें पीने के लिए पानी तक नहीं मिलता था चपरासियों द्वारा भी फाइलें दूर से ही फेंकी जाती थी, उनके आने और जाने के पहले फर्श पर पड़ी चटाइयां हटा दी जाती थीं, इस अमानुषीय अत्याचारों के बाद भी वे अपनी अधूरी पड़ी शिक्षा पूरी करने में हमेसा अग्रसर रहते थे पर उन्हें पढ़ाई के लिए ग्रंथालय में तभी जाने की अनुमति मिलती थी जब वहां खाली समय में दूसरा और कोई नही होता था, यह किसी महान विद्वान के साथ अमानवीय अपमान की एक पराकाष्ठा ही थी, जिसका मूल कारण था भारत में व्याप्त मनुवादी वर्ण व्यवस्था के जातिवादी आतंक के काले कानून का कहर.

एक दिन मनुवादी वर्ण व्यवस्था के आतंक नें सारी हद ही तोड़ दी बाबासाहब जिस पारसी धर्मशाला में रहते थे वहां एक दिन पारसियों का क्रोध से आग बबूला बड़ा झुंड हाथ में लाठियां लेकर आ पहुंचा ,झुंड के एक व्यक्ति ने बाबासाहब से पूंछा तुम कौन हो बाबासाहब नें तुरंत जवाब दिया मैं एक हिन्दू हूँ, जवाब सुनकर उस व्यक्ति ने आगबबूला होकर कहा तुम कौन हो यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ, तुमने हमारे अतिथि गृह को पूरा भ्रष्ट कर दिया तुम यहाँ से अभी तुरंत निकल जाओ, बाबासाहब नें अपनी सारी शक्ति इकट्ठा करके उनसे अनुरोध पूर्वक कहा अभी रात है मुझे आप केवल आठ घंटे की और मोहलत दीजिये सुबह मैं आपका यह आवास स्वयं ही खाली कर दूंगा, उस भीड़ ने तनिक भी देर नहीं लगाई और बाबासाहब का सारा सामान कमरे से बाहर सड़क पर फेंक दिया, तब बाबासाहब नें बहुत प्रयास किया पर रातभर के लिए भी उन्हें वहां कोई हिन्दू या मुसलमान आश्रय देने के लिए तैयार नहीं हुआ.

आखिर भूंखे प्यासे बाबासाहब रात में ही शहर से बाहर निकलने पर मजबूर हुए, और उन्होंने एक बाग में पेंड़ के नीचे रोते हुए सारी रात बिताई, ऊपर खुला आसमान और नीचे खुली जमीन आज दुनियाँ के सबसे बड़े विद्वान का यही एक एकलौता सहारा था,

बाबासाहब ने वही पेड़ के नीचे रोते हुए संकल्प लिया कि “मैं अपने दबे कुचले अस्पृश्य समूचे समाज को इस घिनौने दलदल से निकालने के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दूंगा”, आज बड़ौदा की वही जमीन बाबासाहब के “संकल्प भूमि ” के नाम से जानी जाती है जहां पर समूचे देश के अम्बेडकरवादी इकट्ठा होकर उनके संकल्प को दोहराने का सतत प्रयास जारी रखते हैं.

सुबह होने पर बाबासाहब पुनः बम्बई वापस आ गए.

आज भारत के समूचे बहुजन समाज ने बाबासाहब के उसी पेंड़ के नीचे किये गए संकल्प का पूरा फायदा उठाया पढ़े लिखे ऊंचे ऊंचे ओहदे पर पहुंचे और अपनें लिए ऊंची ऊंची बड़ी बड़ी बिल्डिंगें बनायीं पर बाबासाहब के लिए कही कोई रंचमात्र भी जगह शेष नही छोड़ी इससे बड़ा दुःखद अन्याय भला किसी विद्वान महापुरुष के लिए और क्या हो सकता है.

SOURCE मिशन अम्बेडकर (FB)

This post was last modified on July 2, 2017, 4:30 pm

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